Term: Dhamar MCQs Quiz | Class 10
This quiz is for Class X, Hindustani Music Vocal (Code 034), Unit 1, covering Term: Dhamar. You will find questions related to the definition of Dhamar and its connection to Dhrupad. After attempting all questions, click “Submit Quiz” to see your score, and then “Download Answer PDF” to get a detailed answer sheet.
धमार: एक परिचय (Dhamar: An Introduction)
धमार भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक महत्वपूर्ण गायन शैली है, जिसका गहरा संबंध ध्रुपद शैली से है। यह विशेषकर ब्रज क्षेत्र में विकसित हुई और होली जैसे त्योहारों पर गाई जाती है। धमार अपनी ओजपूर्ण प्रस्तुति, गंभीर प्रकृति और लयकारी के लिए जानी जाती है। इसमें मुख्य रूप से होली, राधा-कृष्ण के प्रेम और उनकी लीलाओं का वर्णन होता है।
धमार की परिभाषा (Definition of Dhamar)
धमार एक गंभीर प्रकृति की गायन शैली है जो 14 मात्राओं की धमार ताल में गाई जाती है। इसके पदों में मुख्य रूप से होली, राधा-कृष्ण के प्रेम और उनकी लीलाओं का वर्णन होता है। यह गायन शैली अपनी ओजपूर्ण प्रस्तुति और लयकारी के लिए जानी जाती है। इसमें पखावज का संगत अनिवार्य होता है। धमार में ब्रजभाषा के पद विशेष रूप से प्रचलित हैं, जिनमें श्रृंगार रस की प्रधानता होती है। यह ध्रुपद की तरह ही आलाप और लयकारी के सौंदर्य को प्रदर्शित करती है, लेकिन इसकी विषय-वस्तु और ताल-पद्धति इसे ध्रुपद से भिन्न बनाती है।
ध्रुपद से संबंध (Relation to Dhrupad)
धमार और ध्रुपद दोनों ही भारतीय शास्त्रीय संगीत की प्राचीन और गंभीर गायन शैलियाँ हैं, जिनके बीच कई समानताएँ और कुछ महत्वपूर्ण अंतर हैं।
समानताएँ (Similarities)
- गंभीर प्रकृति: दोनों शैलियाँ गंभीर और गरिमापूर्ण होती हैं, जिनमें भावनाओं की गहराई और राग की शुद्धता पर जोर दिया जाता है।
- आलाप और नोम-तोम: ध्रुपद की तरह, धमार में भी विस्तारपूर्वक आलाप और नोम-तोम का प्रयोग होता है, जो राग के स्वरूप को स्पष्ट करता है।
- पखावज संगत: दोनों शैलियों में पखावज का प्रयोग अनिवार्य रूप से संगत वाद्य के रूप में होता है, जो लय और ताल को मजबूती प्रदान करता है।
- शुद्ध रागों का प्रयोग: दोनों में शुद्ध और प्रचलित रागों का ही प्रयोग किया जाता है, जिससे उनकी शास्त्रीय शुद्धता बनी रहती है।
- प्राचीन भारतीय संगीत परंपरा: दोनों ही शैलियाँ प्राचीन भारतीय संगीत परंपरा का अभिन्न अंग हैं और सदियों से चली आ रही हैं।
अंतर (Differences)
- ताल: ध्रुपद विभिन्न तालों (जैसे चौताल, सुलताल, तीव्र ताल) में गाया जा सकता है, जबकि धमार केवल 14 मात्राओं की धमार ताल में ही गाया जाता है।
- विषय-वस्तु: ध्रुपद में ईश्वर भक्ति, राजाओं की स्तुति, दार्शनिक विचार आदि विषय होते हैं, जबकि धमार में मुख्यतः होली, फाग और श्रृंगार रस प्रधान होता है, जिसमें राधा-कृष्ण की लीलाओं और प्रेम का वर्णन होता है।
- पदों की संरचना: ध्रुपद में आमतौर पर चार भाग (स्थाई, अंतरा, संचारी, आभोग) होते हैं। धमार में पद अपेक्षाकृत छोटे होते हैं और अक्सर एक या दो भागों में ही पूरे हो जाते हैं।
- उद्भव और विकास: ध्रुपद का विकास राज दरबारों में हुआ, जबकि धमार का विकास मुख्य रूप से ब्रज क्षेत्र में लोक परंपरा और त्योहारों से जुड़ा रहा।
धमार ताल की संरचना (Structure of Dhamar Taal)
धमार ताल 14 मात्राओं की एक जटिल और मधुर ताल है, जिसमें 4 विभाग होते हैं। इसका विवरण इस प्रकार है:
| विभाग (Division) | मात्राएँ (Beats) | बोल (Syllables) | चिन्ह (Symbol) |
|---|---|---|---|
| 1 | 1, 2, 3, 4 | क धि ट धि ट | X (सम) |
| 2 | 5, 6 | धा | 2 |
| 3 | 7, 8, 9, 10 | ग दि न | 0 (खाली) |
| 4 | 11, 12, 13, 14 | धि न | 3 |
कुल मात्राएँ: 14
विभाग: 4
सम: पहली मात्रा पर (X)
खाली: आठवीं मात्रा पर (0)
त्वरित पुनरीक्षण (Quick Revision)
- धमार भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक प्राचीन गायन शैली है।
- यह 14 मात्राओं की धमार ताल में गाई जाती है।
- मुख्यतः होली त्योहार से संबंधित है और इसमें राधा-कृष्ण की लीलाओं का वर्णन होता है।
- यह ध्रुपद से मिलती-जुलती गंभीर प्रकृति की शैली है, जिसमें आलाप और पखावज का प्रयोग होता है।
- इसके पद ब्रजभाषा में रचित होते हैं और श्रृंगार रस प्रधान होते हैं।
- पखावज का संगत धमार गायन में अनिवार्य होता है।
- इसका विकास मुख्य रूप से ब्रज क्षेत्र में हुआ।
अभ्यास प्रश्न (Practice Questions)
- धमार शैली में किस रस की प्रधानता होती है?
- पखावज के अतिरिक्त धमार में और कौन सा वाद्य प्रयोग होता है?
- ध्रुपद और धमार में एक प्रमुख अंतर स्पष्ट करें।
- धमार ताल के बोल लिखें।
- धमार गायन के दो प्रमुख कलाकारों के नाम बताएँ।

Content created and reviewed by the CBSE Quiz Editorial Team based on the latest NCERT textbooks and CBSE syllabus. Our goal is to help students practice concepts clearly, confidently, and exam-ready through well-structured MCQs and revision content.