दिल्ली तबला घराना (संक्षिप्त अध्ययन) MCQs क्विज़ | कक्षा 10
कक्षा: X, विषय: हिन्दुस्तानी संगीत (ताल वाद्य) (कोड 036), इकाई: इकाई 2, विषय: दिल्ली तबला घराना (संक्षिप्त अध्ययन)। इस क्विज़ में दिल्ली तबला घराने की उत्पत्ति, शैलीगत विशेषताओं और प्रमुख लक्षणों को शामिल किया गया है। अपने उत्तर सबमिट करें और अपनी प्रदर्शन रिपोर्ट की PDF डाउनलोड करें।
दिल्ली तबला घराना: एक विस्तृत अध्ययन
दिल्ली तबला घराना भारतीय शास्त्रीय संगीत में तबला वादन के सबसे पुराने और सबसे मौलिक घरानों में से एक है। इसकी स्थापना 18वीं शताब्दी में उस्ताद सिद्धार खान धड़ी ने की थी। यह घराना अपनी सूक्ष्मता, स्पष्टता और बंद बोलों (जैसे ति, ते, ता, कट) के बारीक काम के लिए जाना जाता है।
उत्पत्ति (Origin)
दिल्ली घराने की नींव 18वीं शताब्दी में उस्ताद सिद्धार खान धड़ी ने रखी थी। उन्हें तबला वादन की एक नई शैली विकसित करने का श्रेय दिया जाता है, जो मूलतः पखावज वादन से प्रेरित थी लेकिन उसने एक स्वतंत्र पहचान बनाई। उनके पुत्र मोदू खान और बकर खान ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया और इसे मजबूत किया, जिससे यह घराना भारतीय शास्त्रीय संगीत परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर सका।
शैलीगत विशेषताएँ (Style Features)
- बंद बोलों का प्रभुत्व: दिल्ली घराना खुले बोलों (जैसे धा, धिन, तिरकिट) के बजाय बंद बोलों (जैसे ति, ते, ता, कट) पर अधिक जोर देता है। यह इसे अन्य घरानों से अलग करता है।
- ‘दो उंगली का काम’: इस शैली में तर्जनी और मध्यमा उंगली का बारीक और स्पष्ट प्रयोग इसकी प्रमुख पहचान है। यह नाजुक और जटिल बोलों को स्पष्टता से प्रस्तुत करने में मदद करता है।
- ‘किन्नार का बोल’: तबले के ‘किन्नार’ (किनारे) का प्रयोग करके उत्पन्न होने वाले सूक्ष्म और बारीक स्वर दिल्ली घराने की विशिष्टता हैं।
- ‘पेशकार’ की उत्पत्ति: ‘पेशकार’ तबला वादन की एक परिचयात्मक रचना है, जिसकी उत्पत्ति दिल्ली घराने में मानी जाती है। यह कायदे की तरह विस्तार योग्य होती है लेकिन इसकी अपनी विशिष्ट पहचान है।
- छोटे और स्पष्ट बोल: घराने की विशेषता ‘छोटे बोलों’ (delicate strokes) पर ध्यान केंद्रित करना है जो अत्यधिक स्पष्टता और सफाई के साथ प्रस्तुत किए जाते हैं।
प्रमुख लक्षण (Key Characteristics)
- स्पष्टता और सफाई: दिल्ली घराने के वादक बोलों की प्रत्येक ध्वनि में अत्यधिक स्पष्टता और सफाई को प्राथमिकता देते हैं।
- नाजुक और कोमल वादन: यह शैली अपनी कोमलता और नाजुकता के लिए जानी जाती है, जहाँ शक्ति की बजाय सूक्ष्मता और बारीकी पर बल दिया जाता है।
- कम गूंज वाले बोल: खुले बोलों की तुलना में, जो गूंज पैदा करते हैं, दिल्ली घराने में बंद बोलों का प्रयोग कम गूंज और अधिक स्पष्टता सुनिश्चित करता है।
- मधुरता पर जोर: यद्यपि यह ताल वाद्य है, दिल्ली घराना अपनी प्रस्तुतियों में एक विशेष प्रकार की मधुरता और सौंदर्यशास्त्र पर जोर देता है।
दिल्ली घराना: मुख्य बिंदु (Quick Summary Table)
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| संस्थापक | उस्ताद सिद्धार खान धड़ी |
| प्रमुख शैली | बंद बोलों का बारीक काम (ति, ते, ता, कट) |
| ‘पेशकार’ की देन | हाँ |
| मुख्य उपकरण | तर्जनी और मध्यमा उंगली का प्रयोग |
| जोर | स्पष्टता, सफाई और सूक्ष्मता |
त्वरित पुनरीक्षण (Quick Revision)
- दिल्ली तबला घराने की स्थापना 18वीं शताब्दी में उस्ताद सिद्धार खान धड़ी ने की थी।
- इसकी प्रमुख विशेषता ‘दो उंगली का काम’ (तर्जनी और मध्यमा) और ‘किन्नार के बोलों’ का प्रयोग है।
- यह घराना बंद बोलों (जैसे ति, ते, ता, कट) पर अधिक जोर देता है और खुले बोलों का प्रयोग कम करता है।
- ‘पेशकार’ नामक तबला रचना की उत्पत्ति दिल्ली घराने से मानी जाती है।
- दिल्ली घराने की शैली स्पष्टता, सफाई, कोमलता और सूक्ष्मता पर केंद्रित है।
अभ्यास प्रश्न (Practice Questions)
- दिल्ली घराने के तबला वादक अक्सर किस उंगली का प्रयोग किन्नार पर बोल बजाने के लिए करते हैं?
- ‘Peshkar’ क्या है और यह दिल्ली घराने में क्यों महत्वपूर्ण है?
- दिल्ली घराने की तबला वादन शैली में किन बोलों को प्राथमिकता दी जाती है – खुले या बंद? कारण बताइए।
- सिद्धार खान धड़ी के बाद दिल्ली घराने के दो प्रमुख उत्तराधिकारियों के नाम बताइए।
- दिल्ली घराने की शैली की तुलना किसी अन्य तबला घराने से करते हुए उसकी एक अनूठी विशेषता का उल्लेख करें।